आपके प्रश्नों

  • किडनी फेल्योर में एक किडनी ख़राब होती है या दोनों ?
    दोनों| सामान्यत: जब किसी मरीज की एक किडनी बिल्कुल ख़राब हो जाती है, तब भी मरीज को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती है| खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता है| जब दोनों किडनी ख़राब हो जाए, तब शरीर का अनावश्यक कचरा जो की किडनी द्वारा साफ किया जाता है, शरीर से नहीं निकलता है| जिससे खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा बढ़ जाती है| खून की जाँच करने पर क्रीएटिनिन एवं यूरिया की मात्रा में वृधि किडनी फेल्योर दर्शाता है| ६. किडनी के रोग के संबंध में गलत धारणाए और हकीकत, Page : 25
  • किडनी फेल्योर के दो मुख्य प्रकार एक्यूट किडनी फेल्योर और क्रोनिक किडनी फेल्योर में क्या अंतर है ?
    एक्यूट किडनी फेल्योर में सामान्य रूप से काम करती दोनों किडनी विभिन्न रोगो के कारण प्रभावित होने के बाद अल्प अवधि में ही काम करना कम या बंद कर देती है| यदि इस रोग का तुरन्त उचित उपचार किया जाए, तो थोड़े समय में ही किडनी संपूर्ण रूप से पुन: काम करने लगती है| जबकि क्रोनिक किडनी फेल्योर में अनेक प्रकार के रोगों के कारण किडनी की कार्यक्षमता क्रमशः महीनों या वर्षों में कम होने लगती है और दोनों किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है| वर्त्तमान चिकित्सा विज्ञान में क्रोनिक किडनी फेल्योर को ठीक या संपूर्ण नियंत्रित करने की कोंई दवा उपलब्ध नहीं है| ८. किडनी फेल्योर क्या हे ?, Page : 37
  • क्रोनिक किडनी फेल्योर के लक्षण क्या है ?
    क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ के अलग-अलग मरीजों में किडनी की कार्यक्षमता के आधार पर अलग-अलग लक्षण देखने को मिलते है| क्रोनिक किडनी फेल्योर की शुरुआत में मरीजों को कोई तकलीफ नहीं होती है|इस अवस्था में मेडिकल चेकअप के दौरान आकस्मिक रूप से, अधिकांश मरीजों में इस रोग का निदान होता है|

    किडनी की कार्यक्षमता में ज्यादा कमी होने पर ज्यादातर मरीजों में कमजोरी, खून की कमी, सूजन, उच्च रक्त्चाप, रात के समय पेशाब की मात्रा में वृध्धि इत्यादि लक्षण दिखाई देते है|

    किडनी की कार्यक्षमता जब ८० प्रतिशत तक घट जाए तब अंतिम अवस्था में दिखाई देनेवाले लक्षण जैसे उल्टी, उबकाई आना, कमजोरी महसूस होना, साँस फूलना, खून में फीकापन, खून की उल्टी होना,मरीज को अर्धनिद्रा जैसा लगना, शरीर में ऐठन होना तथा बेहाश होना इत्यादि लक्षण दिखने लगते है|
    ११. क्रोनिक किडनी डिजीज के लक्षण और निदान, Page : 47
  • क्रोनिक किडनी फेल्योर का उपचार दवाओं और परहेज द्वारा किस प्रकार किया जाता है ?
    क्रोनिक किडनी फेल्योर के लिए किये जानेवाले मुख्य उपचार निम्नलिखित है|
    किडनी फेल्योर के कारणों का उपचार जैसे डायाबिटीज तथा उच्च रक्त्चाप का उचित इलाज|
    किडनी की कार्यक्षमता बनाये रखने के लिए शरीर में पानी की मात्रा को उचित बनाए रखना और उच्च रक्त्चाप को नियंत्रण में रखना|
    किडनी फेल्योर के लक्षणो का उपचार जैसे की सूजन कम करने के लिए पेशाब बढ़ाने की दवा देना, उल्टी, जी मिचलाना, एसिडिटी आदि का खास दवाओ द्वारा उपचार|
    किडनी को खराब होने से बचाने के लिये किडनी को नुकसान पहुँचानेवाली दवाएं तथा आयुर्वेदिक भस्म आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए,धुम्रपान नहीं करना, तम्बाकू, गुटका तथा शराब का सेवन नहीं करना चाहिए| १२. क्रोनिक किडनी डिजीज के उपचार, Page : 54
  • क्या क्रोनिक किडनी फेल्योर दवाओं से ठीक हो सकता है ?
    क्रोनिक किडनी फेल्योर को ठीक या संपूर्ण नियंत्रण में करने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है| किसी भी उपचार के बावजूद यह रोग धीरे धीरे बढ़ता ही जाता है|
    दवा और परहेज द्वारा उपचार का उददेश्य इस प्रकार है:
    १. रोग के कारण मरीज को होनेवाली तकलीफों से राहत दिलाना| २.किडनी की बची हुई कार्यक्षमता को बनाये रखते हुए किडनी को ज्यादा खराब होने से बचाना अर्थात किडनी खराब होने की तीव्रता को कम करना|
    ३.डायालिसिस अथवा किडनी प्रत्यारोपण की अवस्था को यथासंभव टालने का प्रयास करना |
    १२. क्रोनिक किडनी डिजीज के उपचार, Page : 55
  • क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ में डायलिसिस की जरुरत कब पड़ती है ?
    जब किडनी की कार्यक्षमता में अत्यधिक् कमी आ जाए या किडनी पूरी तरह से काम करना बंद कर दे, तब दवाओं द्वारा उपचार के बावजूदभी किडनी रोग के लक्षण ( उल्टी, जी मिचलाना, कमजोरी, साँस में तकलीफ होना इत्यादि ) बढ़ने लगते है| इसी अवस्था में डायालिसिस की आवश्यकता पड़ती है| सामान्य तौर पर खून के परीक्षण में यदि सीरम क्रीएटिनिन की मात्रा ८-१० मि. ग्रा प्रतिशत से ज्यादा हो तब डायालिसिस किया जाना चाहिए| १३. डायालिसिस, Page : 63
  • क्या एक बार डायालिसिस कराने पर बार-बार डायालिसिस कराने की आवश्यकता पड़ती है ?
    कितनी बार डायालिसिस कराने की जरुरत है, वह किडनी फेल्योर के प्रकार पर निर्भर करता है| एक्यूट किडनी फेल्योर में मरीजों को कुछ दिन डायालिसिस कराने के बाद, किडनी पुन: पूरी तरह से काम करने लगती है और फिर से डायालिसिस कराने की जरुरत नहीं रहती है| गलत धारणाओ की वजह से डायलिसिस में विलम्ब करने से मरीज की मुत्यु भी हो सकती है| वैसे क्रोनिक किडनी फेल्योर के अंतिम चरण में तबियत अच्छी रखने के लिए नियमित डायालिसिस अनिवार्य है| १३. डायालिसिस, Page : 63
  • सी.ए.पी.डी. क्या है ?
    सी-अर्थात कन्टीन्युअस, जिसमे डायालिसिस की क्रिया निरंतर चालू रहती है, ए- अर्थात एम्ब्युलेटरी, इस क्रिया के दौरान मरीज घूम फिर सकता है और साधारण काम भी कर सकता है, पी.डी.अर्थात -पेरीटोनियल डायालिसिस की यह प्रकिया है सी.ऐ.पी.डी.में मरीज अपने आप घर में रहकर स्वयं बिना मशीन के डायालिसिस कर सकता है| १३. डायालिसिस, Page : 81
  • सी.ए.पी.डी. की प्रक्रिया क्या है ?
    इस प्रकार के डायालिसिस में मरीज अपने आप बिना मशीन के अपने घर में रहकर डायालिसिस कर सकता है| सी.ए.पी.डी. में अनेक छेंदोवाली नली को पेट में नाभि के नीचे छोटा चीरा लगाकर रखा जाता है| इस नली द्वारा पी.डी. द्रव पेट में डाला जाता है| यह द्रव जब कुछ घंटो के बाद बाहर निकाला जाता है तब खून का कचरा पी.डी.के द्रव में छनकर आ जाता है| १३. डायालिसिस, Page : 81
  • किडनी प्रत्यारोपण में कौन किडनी दे सकता है ?
    सामान्यतः १८ से ५५ साल की उम्र के दाता की किडनी ली जाती हैं| स्त्री और पुरुषों दोनों एक दुसरे को किडनी दे सकते हैं! मरीज के माता-पिता, भाई, बहन सामान्य रूप से किडनी देने के लिए उपमुक्त माने जाते है| यदि पारिवारिक सदस्य से किडनी नहीं मिलती है तब ऐसी स्थिति में ब्रेन डेथ (दिमागी मृत्यु) हुए व्यक्ति की किडनी (केदेवर किडनी) प्रत्यारोपण की सकती है| १४. किडनी प्रत्यारोपण, Page : 89
  • ब्रेन डेथ क्या है ?
    सरल भाषा में मृत्यु का मतलब ह्रदय का बंद हो जाना है| ब्रेन डेथ- डॉक्टरों द्वारा किया जानेवाला निदान है| ब्रेन डेथ के मरीज में गंभीर नुकसान के कारण दिमाग संपूर्ण रूप से हमेशा के लिए कार्य करना बंद कर देता है, परन्तु वेन्टीलेटर और सघन उपचार की सहायता से साँस चालू रहती है और खून पूरे शरीर में आवश्यक मात्रा में पहुँचता रहता है| इस प्रकार की मृत्यु को ब्रेन डेथ कहा जाता है| १४. किडनी प्रत्यारोपण, Page : 98
  • किडनी पर डायाबिटीज का असर होने का प्रारंभिक अवस्था में निदान किस प्रकार किया जाता है?
    डायाबिटीज का किडनी पर असर के सबसे पहले प्रारंभिक अवस्था में निदान के लिए श्रेष्ठ पद्धति पेशाब में माइक्रोएल्ब्युमिन्यूरिया की जाँच है| इस निदान के लिए माइक्रोएल्ब्युमिन्यूरिया के बाद की श्रेष्ठ पद्धति पेशाब में प्रोटीन की जाँच है| यह सरल एवं कम खर्चे की ऐसी पद्धति है, जो हर जगह उपलब्ध है| कोई लक्षण न होने के बावजूद उच्च रक्तचाप और पेशाब में प्रोटीन का जाना डायाबिटीज का किडनी पर असर का संकेत है| इसलिए डायाबिटीज के मरीजों को हर तीन महीने में रक्तचाप और पेशाब में एल्बूमिन की जाँच कराना जरुरी है| १५. डायबिटीज और किडनी, Page : 108
wikipedia
Indian Society of Nephrology
nkf
kidneyindia
magyar nephrological tarsasag