Prevention and Care of Common Kidney Diseases at Single Clickकिडनी फेल्योर के मरीजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है! तो चलिये साथ मिलकर किडनी के रोगों की रोकथाम करें !

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१२. क्रोनिक किडनी डिजीज के उपचार

Topics
  • क्रोनिक किडनी फेल्योर : उपचार
क्रोनिक किडनी डिजीज के उपचार के मुख्यतः तीन प्रकार है :

1. दवा और परहेज

2. डायालिसिस

3. किडनी प्रत्यारोपण

  • क्रोनिक किडनी डिजीज (क्रोनिक किडनी फेल्योर -CKD) के प्रारंभ में जब किडनी ज्यादा खराब नहीं हुई हो, उस स्थिति में निदान के बाद दवा और आहार में परहेज द्वारा इलाज किया जाता है।
  • दोनों किडनी ज्यादा खराब होने की वजह से जब किडनी की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय कमी आ गई हो, तब डायालिसिस कराने की जरुरत होती है और उनमें से कई मरीज किडनी प्रत्यारोपण जैसा विशिष्ट उपचार कराते है।

दवा और परहेज से उपचार

क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीजों में दवा और परहेज द्वारा उपचार क्यों महत्वपूर्ण है?

किडनी के ज्यादा खराब होने पर आवश्यक डायालिसिस और किडनी प्रत्यारोपण कराने का खर्च अधिक होता है और यह सुविधा हर जगह आसानी से उपलब्ध भी नहीं है, साथ ही मरीज को संपूर्ण स्वस्थ होने की भी कोई गारंटी नहीं होती है। क्रोनिक किडनी डिजीज में शुरू में उपचार दवा एवं परहेज से ही, कम दाम में हर जगह आसानी से हो सकता है, तो क्यों न हम दवा एवं परहेज से ही किडनी को खराब होने से बचा कर रखे?

क्यों क्रोनिक किडनी डिजीज के कई मरीज दवाओं और परहेज द्वारा उपचार का लाभ लेने में असफल रहते है?

क्रोनिक किडनी डिजीज में शुरू से ही उचित उपचार लेना, किडनी को खराब होने से बचाता है। लेकिन इस रोग के लक्षण प्रारंभ में कम दिखाई देते हैं तथा मरीज अपना दैनिक कार्य आसानी से कर सकता है। इसलिए डॉक्टरों द्वारा जानकारी और हिदायतें देने के बावजूद भी रोग की गंभीरता और समय पर किये गये उपचार से होनेवाले फायदे, कुछ मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों की समझ में नहीं आते हैं।

दोनों किडनी खराब होने के बाद भी उचित उपचार से मरीज लम्बे समय तक स्वस्थ रह सकता है।

कई मरीजों में उपचार संबंधी अज्ञान या लापरवाही देखने को मिलती है। अनियमित, अयोग्य, और अधूरे उपचार के कारण किडनी बहुत शीघ्रता से खराब हो सकती है और निदान के कम समय में ही तबियत ज्यादा खराब होने के कारण डायालिसिस और किडनी प्रत्यारोपण जैसे महंगे उपचार की आवश्यकता पड़ती है। इलाज में लापरवाही एवं उपेक्षा के कारण कई रोगियों को जान से हाथ धोना पड़ सकता है।

दवा और परहेज द्वारा उपचार करने का क्या उद्देश्य है?

सी.के.डी. किडनी की धीरे-धीरे बिगड़ती अवस्था है जिसका कोई इलाज नहीं है।

क्रोनिक किडनी डिजीज में दवा और परहेज द्वारा उपचार का उद्देश्य इस प्रकार है:

  1. 1. रोग के कारण मरीज को होनेवाली तकलीफों से राहत दिलाना।
  2. 2.किडनी की बची हुई कार्यक्षमता को बनाये रखते हुए किडनी को ज्यादा खराब होने से बचाना अर्थात् किडनी खराब होने की तीव्रता को कम करना। अंर्तनिहित कारणों का इलाज करना चाहिए।
  3. 3. लक्षणों से राहत और रोग की जटिलताओं का इलाज महत्वपूर्ण है।
  4. 4. सी.के.डी. के उचित उपचार से ह्रदय रोग होने की संभावनायें कम हो जाती है।
  5. 5. उचित उपचार से तबियत को संतोषजनक रखना और डायालिसिस अथवा किडनी प्रत्यारोपण की अवस्था को यथासंभव टालने का प्रयास करना।
सी.के.डी. के विभिन्न चरणों के उपचार की क्या रणनीति होती है?

नीचे तालिका में सी.के.डी. के विभिन्न चरणों में उपचार की रणनीति और सुझाव संक्षेप में दर्शाये गये हैं।

  • नियमित रूप से किडनी के कार्य की निगरानी और उसकी सुरक्षा के नियमों का पालन करें।
  • जीवन शैली में परिवर्तन करें और सामान्य उपाय अपनायें।
क्रोनिक किडनी डिजीज के मरिज मे आरंभिक उपचार लेना बहुत फायदेमंद रहता है।
क्रोनिक किडनी डिजीज का उपचार दवा और परहेज द्वारा किस प्रकार किया जाता है?

क्रोनिक किडनी डिजीज का दवा द्वारा किया जानेवाले मुख्य उपचार निम्नलिखित है :

  1. 1. क्रोनिक किडनी डिजीज के कारणों का उपचार :
  • डायबिटीज तथा उच्च रक्तचाप का उचित इलाज।
  • पेशाब में संक्रमण का जरुरी उपचार।
  • पथरी के लिए जरुरी ऑपरेशन या दूरबीन द्वारा उपचार।
  • ग्लोमेरुलोनेफ्रोइटिस (किडनी में सूजन), रीनोवेस्क्यूर बीमारी (Renovascular Disease), एनाल्जेसिक नेफ्रोपैथी आदि का उपचार।
  1. 2. किडनी की कार्यक्षमता बनाये रखने की लिए उपचार

सी.के.डी. की प्रगति को धीमी करने के लिये आपके डॉक्टर महत्वपूर्ण और प्रभावी उपाय कर सकते हैं - जैसे

इस रोग को रोकने के लिए किडनी खराब होने के कारणों का उचित उपचार कराना जरुरी होता है।
  • उच्च रक्तचाप को नियंत्रण में रखना।
  • शरीर में पानी की मात्रा को उचित बनाये रखना।
  • शरीर में बढ़ी हुई अम्ल की मात्रा (एसिडोसिस) के इलाज के लिए सोडियम बाइकार्बोनेट अर्थात् सोडामिन्ट का उपयोग करना , जो एक प्रकार का क्षार है।
  • लिपिड को कम करने की चिकित्सा, खून की कमी की चिकित्सा।
3.क्रोनिक किडनी डिजीज के कारण उत्पन्न हुए लक्षणों का उपचार
  • उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) को नियंत्रण में रखना।
  • सूजन कम करने के लिए पेशाब बढ़ाने की दवा (डाइयूरेटिक्स) देना।
  • उलटी, जी मिचलाना, एसिडिटी आदि का खास दवाओं द्वारा उपचार।
  • हडिड्यों की मजबूती के लिए कैल्सियम और सक्रिय विटामिन 'डी' (Alfa D3, Rocaltrol) द्वारा उपचार करना।
  • खून में आये फीकेपन (एनीमिय) के लिए लौहतत्व एवं विटामिन की दवाईयाँ और विशेष दवा एरिथ्रोपोएटिन का इंजेक्शन देकर उपचार करना।
  • ह्रदय की बीमारियों की रोकथाम। डॉक्टर की सलाह के अनुसार रोज एस्प्रिन लें जब तक मना न किया जाय।
4. सुधारे जा सकने वाले कारणों का उपचार

ऐसे कारणों को खोजकर उनका इलाज करें जिनके कारण किडनी की खराबी बढ़ गई है या तीव्र हो गई है। उपचार से इनमें सुधार लाया जा सकता है जिससे किडनी की कार्यक्षमता उचित स्तर पर वापस आ सकती हैं। आम कारण - शरीर में नियमित पानी की मात्रा में अत्यधिक कमी, दवाओं के कारण किडनी की खराबी (स्टेरॉयड मुक्त दर्द नाशक दवाइयाँ, कंट्रास्ट एजेंट, एमिनोग्लाइकोसायड, एंटीबायोटिक्स आदि)।

शरीर या पेशाब में संक्रमण पर तुरंत और पूरी तरह नियंत्रण किडनी खराब होने से बचाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
5. सी. के. डी. की जटिलताओं की पहचान और इलाज
  • सी.के.डी. की जटिलताओं का शीघ्र निदान एवं नेफ्रोलॉजिस्ट द्वारा निर्देशित उपचार करें और उसका लेखा जोखा रखें।
  • सी.के.डी. की सामान्य जटिलताओं में शरीर में पानी की मात्रा अत्याधिक बढ़ जाना, रक्त में पोटैशियम की मात्रा बढ़ जाना (6m Eq/L से ज्यादा) ह्रदय दिमाग और फेफड़ों में गंभीर विकृति हो जाना आदि है, जिसका तुरंत उपचार होना आवश्यक है।
6.जीवन स्तर सुधार ने के उपाय

इनसे किडनी की खराबी होने के खतरे कम हो सकते हैं।

  • धूम्रपान छोड़ें।
  • वजन नियंत्रण में रखें, व्यायाम करें एवं क्रियाशील व् ऊर्जावान बने रहें।
  • तम्बाकू, गुटखा तथा शराब का सेवन ना करे।
  • भोजन का उचित मार्गदर्शन लेकर संतुलित आहार लें एवं नमक की मात्रा कम रखें।
  • डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवायें लें। किडनी की बीमारी की गंभीरता के अनुसार उनकी मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है।
  • किडनी विशेषज्ञ से नियमित मिले एवं उनके सुझावों का पालन करें।
7.किडनी को होने वाले किसी भी नुकसान को रोकना :
  • किडनी को नुकसान पहुँचानेवाली दवाएं जैसे - कोई एटिबायोटिक्स, दर्दनाशक दवाइँ, आयुर्वेदिक भस्म वगैरह का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • किडनी को नुकसान पहुँचानेवाले अन्य रोगों (जैसे दस्त - उलटी, मलेरिया, सेप्टीसीमिया आदि) का तुरंत उपचार लेना चाहिए।
  • किडनी को सीधे तौर पर नुकसान करनेवाले रोगों जैसे पथरी, मूत्रमार्ग का संक्रमण का समय पर शीघ्र उपचार करना।
क्रोनिक किडनी डिजीज में खाने पीने में उचित परहेज करने से किडनी खराब होने से बचाई जा सकती है।
8. क्रोनिक किडनी डिजीज होने पर भविष्य में होनेवाले उपचार की तैयारियाँ
  • निदान के बाद बायें हाथ की नसों (Veins) को नुकसान से बचाने के लिए नसों में से जाँच के लिए खून नहीं लेना चाहिए, कोई इंजेक्शन नहीं लेना चाहिए तथा ग्लूकोज की बोतल भी नहीं लगानी चाहिए।
  • किडनी ज्यादा खराब होने पर बायें हाथ की धमनी-शिरा को जोड़ कर ए. वी. फिस्च्यूला (Arterio Venous Fistula) बनाना चाहिए, जो लम्बे समय तक हीमोडायालिसिस करने के लिए जरूरी है।
  • अगर मरीज हीमोडायालिसिस करवाना चाहता है तो उसे उसके परिवार को इस विषय पर शिक्षित किया जाना चाहिए और सलाह देनी चाहिए की एक ए.वी. फिस्च्युला बनवा लें। यह हीमोडायालिसिस शुरू करने के 6 से 12 महीने पहले ही बनवा लेनी चाहिए।
  • सी.के.डी. रोगी किडनी प्रत्यारोपण के लिए मंजूरी प्राप्त कर सकता हैं। ऐसे में डायालिसिस के पहले ही रोगी को जीवित दाता से कडनी लेकर प्रत्यारोपण किया जा सकता है।
  • हिपेटाइटिस 'बी' वैक्सीन के इंजेक्शन का कोर्स यदि जल्दी लिया जा सके तो डायालिसिस अथवा किडनी प्रत्यारोपण के समय हिपेटाइटिस 'बी' (जहरीला पीलिया) के होनेवाले खतरे से बचा जा सकता है।
9.खाने में परहेज :

किडनी की बीमारी की गंभीरता और प्रकार पर आहार का प्रतिबंध निर्भर करता हैं

  • नमक (सोडियम): उच्च रक्त्चाप (हाई ब्लड प्रेशर) को नियंत्रण में रखने और सूजन कम करने के लिए नमक कम खाना चाहिए। ऐसे मरीजों के आहार में हर दिन नमक की मात्रा 3 ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। ज्यादा नमक वाले खाघ पदार्थ जैसे - पापड़, अचार, अमचूर, वेफर्स नहीं खाना चाहिए।
  • पानी की मात्रा:पेशाब कम आने से शरीर में सूजन तथा साँस लेने में तकलीफ हो सकती है। जब शरीर में सूजन हो, तो कम मात्रा में पानी और पेय पदार्थ लेना चाहिए, जिससे सूजन का बढ़ना रोका जा सकता है। ज्यादा सूजन को कम करने के लिए 24 घण्टे में होने वाले पेशाब की मात्रा से कम मात्रा में पानी और पेय पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है।
किडनी की सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपचार खून के दबाव को हमेंशा के लिए नियंत्रण में रखaना है।
  • पोटैशियम:किडनी डिजीज के रोगियों को ज्यादा पोटैशियम वाले खाघ पदार्थ जैसे की फल, सुखा मेवा, नारियल पानी इत्यादि कम या न लेने की सलाह दी जाती है। पोटैशियम की बढ़ती मात्रा हृदय पर गंभीर एवं जानेवाले प्रभाव डाल सकती है।
  • प्रोटीन: किडनी डिजीज के रोगियों को ज्यादा प्रोटीन वाले खाघ पदार्थ नहीं लेने की सलाह दी जाती है। शाकाहारी मरीजों के खान-पान में बड़ा परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती है। निम्न प्रकार के प्रोटीन वाले खाघ पदार्थ जैसे दालें कम मात्रा में लाने की सलाह दी जाती है।
  • कैलोरी : शरीर में कैलोरी की उचित मात्रा (35 Kcal / Kg ) शरीर के लिए आवश्यक पोषण और प्रोटीन का आवश्यकता व्यय रोकने के लिए जरूरी है।
  • फॉस्फोरस : फॉस्फोरस युक्त पदार्थ किडनी डिजीज के मरीजों को कम मात्रा में लेना चाहिए। किडनी डिजीज के रोगियों के खान-पान से संबंधित सभी आवश्यक सूचनाएं विस्तृत रूप से अध्याय - 27 में दी गई हैं।
क्रोनिक किडनी डिजीज का दवा द्वारा उपचार करने में सबसे महत्वपूर्ण उपचार कौन सा है ? Kidney In Hindi

इस रोग के उपचार में उच्च रक्तचाप को हमेंशा उचित नियंत्रण में रखना सबसे महत्वपूर्ण है। किडनी डिजीज के अधिकतर मरीजों में खून के दबाव का ऊँचा होना देखा जाता है जो की क्षति ग्रस्त कमजोर किडनी के लिए बोझस्वरूप बन किडनी को ओर ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। अनियंत्रित रक्तचाप से सी.के.डी. की दशा तेजी से बिगड़ती है और दूसरी जटिलताएँ जैसे दिल का दौरा और स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है।

खून के दबाव कम करने के लिए कौन सी दवा ज्यादा उपयोगी होती है ?

उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखने के लिए दवाओं द्वारा उचित उपचार किडनी रोग विशेषज्ञ नेफ्रोलॉजिस्ट या फिजिशियन करते हैं और उनके द्वारा ही दवाओं का चयन किया जाता है। खून के दबाव को घटाने के लिए कैल्सियम चैनल ब्लॉकर्स, बीटा ब्लॉकर्स, डाइयुरेटिक्स इत्यादि दवाओं का प्रयोग किया जाता है।

क्रोनिक किडनी डिजीज में खून के फीकेपन का श्रेष्ठ उपचार दवाई और एरिथ्रोपोएटिन है।

किडनी डिजीज की प्रारंभिक अवस्था में ए. सी. ई. अथवा ए. आर. बी. प्रकार की दवाइयाँ को विशेष रूप से पसंद किया जाता है। ये दवाइँ रक्तचाप कम करने के साथ साथ क्षति ग्रस्त किडनी के अधिक खराब होने cकी प्रक्रिया को धीमा करने का महत्वपूर्ण व लाभदायक कार्य करती है।

क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीजों में खून का दबाव कितना होना चाहिए ?

किडनी को ज्यादा खराब होने से बचाने के लिए खून का दबाव हमेंशा के लिए 140 /84 से कम होना बहुत जरूरी है।

खून का दबाव नियंत्रण में है यह कैसे जाना जा सकता है? इसके लिए कौन सी पध्दति श्रेष्ठ है ?

निश्चित अवधि में डॉक्टर के पास जाकर ब्लडप्रेशर नपवाने से जाना जा सकता है की खून का दबाव नियंत्रण में है या नहीं। किडनी की सुरक्षा के लिए ब्लडप्रेशर का हमेशा नियंत्रण में रहना जरुरी होता है। जिस तरह डायाबिटीज (मधुमेह) के मरीज स्वयं ही ग्लूकोमीटर से खून में शक्कर की मात्रा नापते हैं, उसी तरह परिवार के सदस्य यदि ब्लडप्रेशर नापना सिखजाएं, तो यह श्रेष्ठ उपाय है। रोज ब्लडप्रेशर नापकर उसको डायरी में लिखकर डॉक्टर के ध्यान में लाने से डॉक्टर दवा में प्रभावकारी परिवर्तन कर सकते है।

किडनी डिजीज में उपयोग में आने वाली डाइयूरेटिक्स दवाइँ क्या हैं ?

किडनी डिजीज में पेशाब कम आने से सूजन और साँस लेने में तकलीफ हो सकती है। डाइयूरेटिक्स के नाम से पहचानी जानेवाली दवाईयाँ पेशाब की मात्रा बढ़ाकर सूजन और साँस लेने की तकलीफ में राहत देती हैं। यह ध्यान में रखना जरूरी है की ये दवाइँ पेशाब बढ़ाने में उपयोगी हैं, किडनी की कार्यक्षमता बढ़ाने में ये कोई मदद नहीं करती हैं।

किडनी डिजीज में खून में फीकापन आने का उपचार क्या है?

जब किडनी ठीक से कार्य करती है तो वे एक हार्मोन का उत्पादन करती है। जिनका नाम एरीथ्रोपोइटिन है, जो लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करने के लिए अस्थि मज्जा को प्रेरित करती है। जब किडनी अपना कार्य करने की क्षमता कम कर देती है तो एरीथ्रोपोइटिन की कमी से रक्ताल्पता/एनीमिया हो जाता है।

इसके लिए जरूरी लौहतत्व और विटमिनवाली दवाईयाँ दी जाती हैं। जब किडनी ज्यादा खराब हो जाती है, तब ये दवाइँ देने के बाद भी हीमोग्लोबिन में कमी देखने को मिलती है। ऐसे मरीजों में विशेष एरिथ्रोपोएटिन के इंजेक्शन दिये जाते है। इस इंजेक्शन के प्रभाव से हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ती है। यघपि इस इंजेक्शन को सुरक्षित, प्रभावकारी और सरलता से दिया जा सकता है, परन्तु अधिक महँगा होने के कारण सभी मरीज इस का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार के रोगियों के लिए रक्तदान लेना कम खर्चीला है, परन्तु उस उपचार में ज्यादा खतरा होता है।

खून में आये फीकेपन का उपचार क्यों जरूरी है?

खून में उपस्थित हीमोग्लोबिन, फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर पुरे शरीर में पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम करता है। खून में फीकेपन का होना यह दर्शाता है की खून में हीमोग्लोबिन कम है। जिसके कारण मरीज को कमजोरी लगती है एवं जल्दी थक जाता है। थोड़े काम के बाद ही साँस फूलने लगती है, छाती में दर्द होने लगता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और कई प्रकार की तकलीफों का सामना करना पड़ता है। इसलिए किडनी डिजीज के रोगियों की तन्दुरुस्ती के लिए खून के फीकेपन का उपचार अति आवश्यक है। खून में कमी का बूरा असर हृदय की कार्यक्षमता पर भी पड़ता है जिसे बनाए रखने के लिए हीमोग्लोबिन का बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।

10. नेफ्रोलॉजिस्ट द्वारा मरीज की समय पर जाँच एवं देखभाल:
  • किडनी को होनेवाले नुकसान से बचाने के लिए मरीज को नियमित रूप से नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलकर सलाह लेना और जाँच कराना अत्यंत जरुरी है।
  • नेफ्रोलॉजिस्ट, मरीज की तकलीफ और किडनी की कार्यक्षमता को ध्यान में रखते हुए जरूरी उपचार निश्चित करता है।
क्रोनिक किडनी डिजीज में तबियत ठीक रखने के लिए, खून में हीमोग्लोबिन की उचित मात्रा का होना महत्वपूर्ण है।
wikipedia
Indian Society of Nephrology
nkf
kidneyindia
magyar nephrological tarsasag