Prevention and Care of Common Kidney Diseases at Single Clickकिडनी फेल्योर के मरीजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है! तो चलिये साथ मिलकर किडनी के रोगों की रोकथाम करें !

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१५. डायबिटीज और किडनी

Topics
  • डायाबिटीज और किडनी
  • माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया
  • निदान
  • रोकथाम
  • उपचार

विश्व और समस्त भारत में बढ़ती आबादी और शहरीकरण के साथ-साथ डायाबिटीज (मधुमेह) के रोगियों की संख्या भी बढ़ रही है। डायाबिटीज के मरीजों में क्रोनिक किडनी डिजीज (डायाबिटीक नेफ्रोपैथी) और पेशाब में संक्रंमण के रोग होने की संभावना ज्यादा होती है।

डायाबिटिक किडनी डिजीज क्या है?

लम्बे समय से चली आ रही मधुमेह की बीमारी में लगातार उच्च शर्करा से किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं को काफी नुकसान होता है। शुरू में इस नुकसान के कारण पेशाब में प्रोटीन की मात्रा दिखाई देती है। जिसके फलस्वरूप उच्च रक्तचाप, शरीर में सूजन जैसे लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं जो धीरे-धीरे किडनी को ओर नुकसान पहुँचते हैं। किडनी की कार्य क्षमता में लगातार गिरावट होती जाती है और किडनी, विफलता की ओर अग्रसर हो जाती हैं। (एण्ड किडनी डिजीज)। मधुमेह के कारण जो किडनी की समस्या होती है उसे डायाबिटिक किडनी डिजीज कहते हैं। इसका मेडिकल शब्द डायाबिटिक नेफ्रोपौथी है।

डायाबिटीज के कारण होनेवाले किडनी डिजीज के विषय में प्रत्येक मरीज को जानना क्यों जरुरी है?
  1. क्रोनिक किडनी डिजीज के विभिन्न कारणों में सबसे महत्वपूर्ण कारण डायाबिटीज है जो अत्यंत विकराल रूप से फैल रहा है।
  2. डायालिसिस करा रहे क्रोनिक किडनी डिजीज के 100 मरीजों में 35 से 40 मरीजों की किडनी खराब होने का कारण डायाबिटीज होता है।
  3. डायाबिटीज के कारण मरीजों की किडनी पर हुए असर का जरूरी उपचार यदि जल्दी करा लिया जाए, तो भयंकर रोग किडनी डिजीज को रोका जा सकता है।
  4. डायाबिटिक किडनी डिजीज से पीड़ित रोगियों में ह्रदय रोगों के होने एवं उनसे मृत्यु होने का खतरा बढ़ जाता है।
  5. डायाबिटीज के कारण किडनी खराब होना प्रारंभ होने के बाद यह रोग ठीक हो सके ऐसा संभव नहीं है। परन्तु शीघ्र उचित और परहेज द्वारा डायालिसिस और किडनी
प्रत्यारोपण जैसे महंगे और मुश्किल उपचार को काफी समय के लिए (सालों तक भी) टाला जा सकता है।
डायाबिटीज के मरीजों की किडनी खराब होने की संभावना कितनी होती है।

डायाबिटीज के मरीजों को दो अलग-अलग भागों में बाँटा जा सकता है:

टाइप - 1, अथवा इंसुलिन डीपेन्डेन्ट डायाबिटीज (IDDM-Insulin Dependent Diabetes Mellitus) साधारणतः कम उम्र में होनेवाले इस प्रकार के डायाबिटीज के उपचार में इंसुलिन की जरूरत पडती है। इस प्रकार के डायाबिटीज में बहुत ज्यादा अर्थात 30 से 35 प्रतिशत मरीजों की किडनी खराब होने की संभावना रहती है।

टाइप - 2 , अथवा नॉन- इंसुलिन डीपेन्डेन्ट डायाबिटीज (N.I.D.D.M.-Non-Insulin Dependent Diabetes Mellitus) डायाबिटीज के अधिकतर मरीज इसी प्रकार के होते हैं। वयस्क (Adults) मरीजों में इसी प्रकार की डायाबिटीज होने की संभावनाएँ ज्यादा होती हैं, जिसे मुख्यतः दवा की मदद से नियंत्रण में लिए जा सकता है। इसी प्रकार के डायाबिटीज के मरीजों में 10 से 40 प्रतिशत मरीजों की किडनी खराब होने की संभावना रहती है।

मधुमेह के रोगी में डायाबिटिक किडनी डिजीज कब शुरू होती है?

मधुमेह के रोगी में डायाबिटिक किडनी डिजीज होने में कई साल लग जाते हैं। इसलिए मधुमेह होने के बाद पहले 10 साल में यह बीमारी शायद ही कभी हो। टाइप 1 मधुमेह की शुरुआत के 15 से 20 साल के बाद किडनी की बीमारी के लक्षण प्रगट हो सकते है। मधुमेह की शुरुआत से ही सही उपचार से एक मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति को शुरू के 25 वर्षों में डायाबिटिक किडनी डिजीज होने का खतरा कम हो सकता है।

डायाबिटीज किस प्रकार किडनी को नुकसान पहुंचा सकती है?
  • किडनी में सामान्यतः प्रत्येक मिनट में 1200 मिली लीटर खून प्रवाहित होकर शुद्ध होता है।
  • डायाबिटीज नियंत्रण में नहीं होने के कारण किडनी में से प्रवाहित होकर जानेवाले खून की मात्रा 40 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, जिससे किडनी को ज्यादा श्रम करना पड़ता है, जो नुकसानदायक है। यदि लम्बे समय तक किडनी को इसी तरह के नुकसान का सामना करना पड़े, तो खून का दबाव बढ़ जाता है और किडनी को नुकसान भी पहुँच सकता है।
डायालिसिस करानेवाले हर तीन मरीजों में से एक मरीज की किडनी खराब होने का कारण डायाबिटीज होता है।
  • उच्च रक्तचाप खराब हो रही किडनी पर बोझ बन किडनी को ज्यादा कमजोर बना देता है।
  • किडनी के इस नुकसान से शुरू -शुरू में पेशाब में प्रोटीन जाने लगता है, जो भविष्य में होनेवाले किडनी के गंभीर रोग की प्रथम निशानी है।
  • इसके बाद शरीर से पानी और क्षार का निकलना जरूरत से कम हो जाता है, फलस्वरूप शरीर में सूजन होने लगती है, (शरीर का वजन बढ़ने लगता है) और खून का दबाव बढ़ने लगता है। किडनी को अधिक नुकसान होने पर किडनी का शुद्धीकरण का कार्य कम होने लगता है और खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा बढ़ने लगती है। इस समय की गई खून की जाँच से क्रोनिक किडनी डिजीज का निदान होता है।
डायाबिटीज के कारण किडनी पर होनेवाले असर कब और किस मरीज पर हो सकता है?

सामान्यतः डायाबिटीज होने के सात से दस साल के बाद किडनी को नुकसान होने लगता है। डायाबिटीज से पीड़ित किस मरीज की किडनी को नुकसान होनेवाला है यह जानना बडा कठिन और असंभव है। नीचे बताई गई परिस्थितियों में किडनी डिजीज होने की संभवना ज्यादा होता है:

  • डायाबिटीज कम उम्र में हुआ हो।
  • लम्बे समय से डायाबिटीज हो।
  • उपचार में शुरू से ही इंसुलिन की जरूरत पड़ रही हो।
  • डायाबिटीज और खून के दबाव पर नियंत्रण नहीं हो।
  • पेशाब में प्रोटीन का जाना।
  • पेशाब में प्रोटीन और बढ़ा हुआ सीरम लिपिड डायाबिटिक किडनी डिजीज के मुख्य लक्षण है जो पेशाब व रक्त जाँच में दिखाई पड़ते हैं।
  • मोटापा और धूम्रपान इसे और बढ़ा देते हैं।
  • डायाबिटीज के कारण रोगी की आँखों में कोई नुकसान हुआ हो (Diabetic Retinopathy)।
  • परिवारिक सदस्यों में डायाबिटीज के कारण किडनी डिजीज हुई हो।
पेशाब में प्रोटीन, खून का ऊँचा दबाव और सूजन किडनी पर डायाबिटीज की असर के लक्षण हैं।
डायाबिटीज से किडनी को होने वाले नुकसान के लक्षण:
  • प्रांभिक अवस्था में किडनी के रोग के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। डॉक्टर द्वारा कराये गये पेशाब की जाँच में आल्ब्यूमिन (प्रोटीन) जाना, यह किडनी के गंभीर रोग की पहली निशानी है।
  • धीरे-धीरे खून का दबाव बढ़ता है और साथ ही पर और चेहरे पैर सूजन आने लगती है।
  • डायाबिटीज के लिए जरुरी दवा या इन्सुलिन की मात्रा में क्रमशः कमी होने लगती है।
  • पहले जितनी मात्रा से डायाबिटीज काबू में नहीं रहता था बाद में उसी मात्रा लेने से डायाबिटीज पर अच्छी तरह नियंत्रण रहता है।
  • बार-बार खून में चीनी की मात्रा कम होना।
  • किडनी के ज्यादा ख़राब होने पर कई मरीजों में डायाबिटीज की दवाई लिए बिना ही डायाबिटीज नियंत्रण में रहता है। ऐसे कई मरीज, डायाबिटीज खत्म हो गया है, यह सोच कर गर्व और खुशी का अनुभव करते हैं, पर दरअसल यह किडनी डिजीज की चिंताजनक निशानी हो सकती है।
  • आँखों पर डायाबिटीज का असर हो और इसके लिए मरीज द्वारा लेजर का उपचार कराने वाले प्रत्येक तीन मरीजों में से एक मरीज की किडनी भविष्य में खराब होती देखी गई है।

किडनी खराब होने के साथ-साथ खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा भी बढ़ने लगती है। क्रोनिक किडनी रोग के लक्षण जैसे कमजोरी, थकान, मितली, भूख में कमी, उल्टी, खुजली, पीलापन और सांस लेने में तकलीफ आदि बीमारी के बाद के चरणों में दिखाई पड़ते हैं।

डायाबिटीज द्वारा किडनी पर होनेवाले असर को किस प्रकार रोका जा सकता है?
    डॉक्टर से नियमित चेकअप कराना।
  1. डायाबिटीज और हाई ब्लडप्रेशर पर नियंत्रण।
  2. शीघ्र निदान के लिए उचित जाँच कराना।
  3. अन्य सुझाव - नियमित कसरत करना, तम्बाकू, गुटखा, पान, बीडी, सिगरेट तथा अल्कोहल (शराब) का सेवन नहीं करना।
खून में चीनी की मात्रा में कमी दिखे या डायाबिटीज ठीक हो जाए, तो यह किडनी डिजीज की निशानी हो सकती है।
  • रक्त में शर्करा का अच्छा नियंत्रण अर्थात् एच.बी.1 सी. (HbA1C ) का स्तर 7 % तक सीमित रखें।
  • चीनी और नमक का सेवन प्रतिबंधित रखें। भोजन में प्रोटीन, असा और कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम रखें।
  • एल्ब्यूमिन के परीक्षण के लिए पेशाब की जाँच और क्रीएटिनिन के परीक्षण के लिए रक्त की जाँच और eGFR की जाँच साल में एक बार अवश्य करायें जिससे आपकी किडनी की पूर्ण जाँच हो सके। नियमित रूप से कसरत करें एवं अपना आदर्श वजन बनाए रखें।
किडनी पर डायाबिटीज का असर होने का शीघ्र निदान किस प्रकार किया जाता है?
श्रेष्ठ पध्दति:

पेशाब में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया (Microalbuminuria) की जाँच।

सरल पध्दति:

तीन महीने में एकबार रक्तचाप की जाँच और पेशाब में एल्ब्यूमिन की जाँच कराना। यह सरल एवं कम खर्चे की ऐसी पध्दति है, जो हर जगह उपलब्ध है। कोई लक्षण न होने के बावजूद उच्च रक्तचाप और पेशाब में प्रोटीन का जाना डायाबिटीज की किडनी पर असर का संकेत है। डायाबिटिक किडनी डिजीज को पहचानने के लिए रक्त परीक्षण किए जाते हैं। प्रोटीन के लिए पेशाब का परीक्षण और क्रीएटिनिन एवं eGFR के लिए रक्त का परीक्षण। जल्द से जल्द डायाबिटिक किडनी डिजीज का पता लगाने के लिए जो आदर्श परीक्षण है उसे माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया परीक्षण कहते हैं। इसे नीचे विस्तृत रूप से समझाया गया है।

माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता लगाने के लिए डिपस्टिक द्वारा पेशाब में एल्बूमिन का परीक्षण किया जाता है। जब सीरम क्रीएटिनिन की मात्रा अधिक होती है, तब यह स्पष्ट है की किडनी की कार्यक्षमता कम है और मरीज डायाबिटिक किडनी डिजीज के डायाबिटिक किडनी डिजीज के अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। डायाबिटिक नेफ्रोपौथी माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के पेशाब में आने के बाद ही होता है।

पेशाब में प्रोटीन की मानक जाँच इस रोग के व्यापक और नियमित निदान के लिए श्रेष्ठ पध्दति है।
माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया और मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया क्या है?

एल्ब्यूमिन्यूरिया का अर्थ हे पेशाब में एल्ब्यूमिन (एक प्रकार का प्रोटीन) का उपस्थित होना। माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का मतलब अल्प मात्रा में प्रोटीन का पेशाब में जाना (30 से 300 mg प्रतिदिन) और जिसे नियमित रूप से किये गए पेशाब परीक्षण से पता ही नहीं लगाया जा सकता है। इसका पता एक विशेष प्रकार के परीक्षण से होता है। मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया का अर्थ है अधिक मात्रा में एल्ब्यूमिन का पेशाब में होना (एल्ब्यूमिन >300 मि.ग्राम/दिन ) और इसका परीक्षण नियमित रूप से किये गए पेशाब के सामान्य परीक्षण से किया जाता है

पेशाब में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया की जाँच कराना क्यों श्रेष्ठ पध्दति है? यह कब और किसे कराना चाहिए?

किडनी पर डायाबिटीज के प्रभाव का सबसे पहला निदान पेशाब में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया की जाँच द्वारा हो सकता है। जाँच की यह श्रेष्ठ पध्दति है क्योंकि इस अवस्था में यदि निदान हो जाए, तो सघन उपचार डायाबिटीज द्वारा किडनी पर होनेवाले दुष्प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है।

यह जाँच टाइप - 1 प्रकार के डायाबिटीज (IDDM) के रोगियों में रोग के निदान के पांच वर्ष बाद प्रत्येक वर्ष कराने की सलाह दी जाती है। जबकि टाइप - 2 प्रकार के डायाबिटीज (NIDDM) में जब रोग निदान हो जाए, तब से प्रारंभ करके प्रत्येक वर्ष यह जाँच कराने की सलाह दी जाती है।

मानक डिपस्टिक द्वारा जो पेशाब का परीक्षण कहते हैं, उसकी अपेक्षा माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया परीक्षण से 5 साल या उससे भी पहले डायाबिटिक नेफ्रोपौथी का पता लगा सकता है। इसके पहले की बढ़े हुए सीरम क्रीएटिनिन की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुँच जाये, इस परीक्षण द्वारा जल्द उपचार शुरू हो सकता है। किडनी के लिए जोखिम होने के अलावा माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया, स्वतंत्र रूप से, मधुमेह के रोगियों को भविष्य ने ह्रदय संबंधी जटिलताओं के बढ़ने का संकेत भी देता है।

माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के प्रारंभिक निदान करने से यह रोगी को इस खतरनाक बीमारी के बढ़ने के बारे में सचेत कर देती है। यह चिकित्सक को और अधिक गति से ऐसे रोगियों का इलाज करने का अवसर प्रदान करता है।

पेशाब की माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया की जाँच डायाबिटीज के किडनी पर पड़नेवाले प्रभाव के शीघ्र निदान के लिए सर्व श्रेष्ठ पध्दति है।
डायाबिटिक किडनी डिजीज के मरीजों के लिए पेशाब में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया परीक्षण कैसे किया जाता है?

डायाबिटिक किडनी डिजीज की स्क्रीनिंग के लिए का परीक्षण पहले मानक पेशाब डिपस्टिक परीक्षण द्वारा किया जाता है। अगर परीक्षण में प्रोटीन की मात्रा नहीं होती है तब माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता लगाने के लिए सूक्ष्म पेशाब परीक्षण किया जाता है। अगर नियमित पेशाब परीक्षण में एल्ब्यूमिन मौजूद है, तो माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के लिए परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं होती है। डायाबिटिक नेफ्रोपौथी के निदान के लिए माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के लिए तीन परीक्षण में से दो का (3 - 6 महीने के अधिक के भीतर) सकारात्मक होना जरुरी है। पर इस दौरान पेशाब पथ में किसी भी प्रकार का संक्रमण नहीं होना चाहिए। माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता लगाने के लिए तीन प्रमुख तरीके हैं :

1. स्पोट यूरिन टेस्ट :

इस परीक्षण में एक अभिकर्मक पट्टी या टैबलेट का उपयोग किया जाता है। यह एक सरल परीक्षण है जिसे साधारण अभ्यास से किया जा सकता है यह कम खर्चीला भी होता है। चूंकि यह परीक्षण पूर्णतः प्रमाणित नहीं है, इसलिए अन्य परीक्षण से इसकी पुष्टि की जानी चाहिए।

2. एल्ब्यूमिन/क्रीएटिनिन रेश्यो :

एल्ब्यूमिन-क्रीएटिनिन रेश्यो माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के परीक्षण करने के लिए सबसे भरोसेमंद, विशिष्ट और सही परीक्षण है। एल्ब्यूमिन-क्रीएटिनिन रेश्यो 24 घंटे के पेशाब के एल्ब्यूमिन उत्सर्जन का अनुमान लगाती है। सुबह के पेशाब में, 30 - 300 मि.ग्राम/ग्राम के बीच एल्ब्यूमिन-क्रीएटिनिन रेश्यो होने पर माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया (एल्ब्यूमिन-क्रीएटिनिन रेश्यो <30 मि.ग्राम/ग्राम सामान्य मूल्य है) का निदान हो सकता है। उपलब्धता और लागत की समस्या के कारण, माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के निदान के लिए मधुमेह के रोगियों का यह परीक्षण का उपयोग विकासशील देशों में संभव है।

3. माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के लिए 24 घंटे का पेशाब इकट्टा करना :

24 घंटे की इकट्टा की हुई पेशाब में 30 से 300 मि.ग्राम एल्ब्यूमिन, माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के होने का संकेत देता है।

विशेष प्रकार की दवा से खून के दबाव पैर उचित नियंत्रण सफल उपचार की कुंजी है।

हलाकि माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के निदान के लिए यह एक मानक तरीका है, पर यह कुछ कष्टकारक है। परीक्षण की सटिकता में इसका कम योगदान रहता है।

डायाबिटिक किडनी डिजीज के निदान में मानक पेशाब डिपस्टिक परीक्षण कैसे मदद करता है?

पेशाब में प्रोटीन का पता लगाने के लिए सबसे व्यापक और नियमित तोर पर इस्तेमाल की जाने वाली विधि है मानक पेशाब डिपस्टिक परीक्षण। यह परीक्षण पेशाब में प्रोटीन की अल्पतम मात्रा जिसे ट्रेस कहते हैं से लेकर अत्याधिक मात्रा (++++) तक माप लेता है। मधुमेह के रोगियों में मानक पेशाब डिपस्टिक परीक्षण, मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता लगाने के लिए एक आसान और त्वरित तरीका है (पेशाब में एल्ब्यूमिन 300 मि.ग्राम/दिन या ज्यादा) पेशाब में मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया की उपस्थिति किडनी की बीमारी का प्रत्यक्ष रूप से चौथा स्तर दर्शाता है।

डायाबिटिक किडनी डिजीज के बढ़ते क्रम में मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया, माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का अनुसरण करता है।

डायाबिटिक किडनी डिजीज का तीसरा चरण:

आमतौर पर तीसरे चरण बाद किडनी की और अधिक गंभीर क्षति हो जाती है। माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता लगाने से डायाबिटिक किडनी डिजीज के मरीज की पहचान जल्दी हो जाती है पर विकासशील देशों में इसकी लागत और अनुपलब्धता, इसके उपयोग को सीमित करती है। एसी परिस्थिति में मैकरोएल्ब्यूमिन्यूरिया का निदान करने के लिए पेशाब डिपस्टिक परीक्षण, डायाबिटिक डिजीज के लिए अगला सबसे अच्छा नैदानिक विकल्प है।

यूरिन डिपस्टिक परीक्षण, एक सरल, सस्ती आसानी से उपलब्ध विधि है। यह छोटे केन्द्रों में भी की जा सकती है। इसलिए डायाबिटिक किडनी डिजीज की बड़े पैमाने पर जाँच के लिए यह एक आदर्श और व्यवहारिक विकल्प है। डायाबिटिक किडनी डिजीज के इस स्तर तक भी उचित उपचार किया जाना फायदेमंद है क्योंकि इसके फलस्वरूप डायालिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता को विलंबित किया जा सकता है।

डायाबिटीज का किडनी पर होनेवाले प्रभाव का उपचार:
  • डायाबिटीज पर हमेंशा उचित नियंत्रण बनाये रखना।
किडनी डिजीज के बाद डायाबिटीज की दवा में जरुरी परिवर्तन करना आवश्यक है।
  • सतर्कतापूर्वक हमेंशा के लिए उच्च रक्तचाप को नियंत्रण में रखना, प्रतिदिन ब्लडप्रेशर मापकर उसे लिखकर रखना चाहिए। खून का दबाव 130/80 से बढ़े नहीं, यह किडनी की कार्यक्षमता को स्थिर बनाये रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपचार है।
  • ए. सी. ई. आई. और ए. आर. बी. ग्रुप की दवाओं को शुरुआत में इस्तेमाल किया जाएं, तो यह दवा खून के दबाव को घटाने के साथ साथ किडनी को होनेवाले नुकसान को कम करने में भी सहायता करती है।
  • सूजन घटाने के लिए डाइयूरेटिक्स दवा और खाने में नमक और पानी कम लेने की स लाह दी जाती है।
  • जब खून में यूरिया और क्रीएटिनिन की मात्रा बढ़ जाती है, तब क्रोनिक किडनी डिजीज के उपचार के विषय में जो चर्चा जी गई है, वे सभी उपचार कराने की मरीज को जरूरत पडती है।
  • किडनी डिजीज के बाद डायाबिटीज की दवा में जरुरी परिवर्तन सिर्फ खून में शक्कर की जाँच की रिपोर्ट के आधार पर ही करना चाहिए। केवल पेशाब में शक्कर की रिपोर्ट के आधार पर दवा में परिवर्तन नहीं करना चाहिए।
  • किडनी डिजीज के बाद साधारणतः डायाबिटीज की दवा की मात्रा को कम करने की जरूरत पडती है।
  • डायाबिटीज के लिए लंबे समय की जगह कम समय तक प्रभाव करनेवाली दवा को पसंद किया जाता है। बहुत नियंत्रण के लिए डॉक्टर ज्यादातर मरीजों में इंसुलिन इस्तेमाल करना पसंद करते हैं।
  • बायगुएनाइडश्स (मेटफ्रॉर्मीन) के रूप में जानी जानेवाली दवा किडनी डिजीज के रोगियों के लिए खतरनाक होने के कारण बंद कर दी जाती हैं।
  • वे कारण जिनसे ह्रदय को किसी भी प्रकार का खतरा उत्पन्न हो उनका गंभीरता से मूल्यांकन करें। जैसे धूम्रपान, उच्च रक्त्चाप उच्च रक्त शर्करा, रक्त में वसा की मात्रा में वृद्धि आदि ।
  • किडनी जब पूरी तरह काम करना बंद कर देती है, तब दवा लेने के बावजूद भी मरीज की तकलीफ बढ़ती जाती है। इस हालत में डायालिसिस अथवा किडनी प्रत्यारोपण की जरुरत पडती है।
इस रोग के मरीज में हृदय की बीमारी होने का खतरा भी काफी ज्यादा होता है।
डायाबिटिक किडनी डिजीज की बीमारी वाले रोगी को कब चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए?

मधुमेह के वे मरीज जिनके पेशाब परीक्षण में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया पाया जाता है उन्हें किडनी रोग विशेषज्ञ के पास भेजा जाना चाहिए। डायाबिटिक किडनी डिजीज के रोगी को डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • अप्रत्याशित रूप से वजन में वृद्धि, पेशाब की मात्रा में उल्लेखनीय कमी, चेहरे और पैर में सूजन में वृद्धि या साँस लेने में तकलीफ हो।
  • छाती में दर्द, पूर्व से मौजूद उच्च रक्त्चाप में ओर वृद्धि, ह्रदय गति में असामान्यताएँ हों।
  • अत्यधिक कमजोरी, भूख में कमी, उल्टी और शरीर में पीलापन होना आदि।
  • लगातार बुखार, ठंड लगना, पेशाब के दौरान जलन या दर्द, पेशाब में रक्त या पेशाब में मवाद जाना।
  • बार-बार हाइपोग्लाइसिमिया होना अर्थात् रक्त में शर्करा का स्तर अत्यधिक कम होना।
  • इंसुलिन या मधुमेह की दवाओं की आवश्यकता में कमी होना।
  • भम्र, उनींदापन या शरीर में ऐंठन होना आदि।
wikipedia
Indian Society of Nephrology
nkf
kidneyindia
magyar nephrological tarsasag